प्रिंटिंग टेक्नोलॉजी

ऑफ़सेट, फ्लेक्सो और डिजिटल प्रिंटिंग में क्या अंतर है?

जानिए ऑफ़सेट, फ्लेक्सो और डिजिटल प्रिंटिंग कैसे काम करती है, कहाँ इस्तेमाल होती है और किसी जॉब के लिए सही प्रोसेस कैसे चुनें।

लेखक: Print Pathshala Team3 मिनटRead in English

किसी भी प्रिंटिंग यूनिट में जाइए, आपको तीन शब्द बार-बार सुनाई देंगे - ऑफ़सेट, फ्लेक्सो और डिजिटल। तीनों सतह पर स्याही लगाने के अलग-अलग तरीके हैं और हर एक की अपनी ख़ूबियाँ हैं। प्रिंटिंग या पैकेजिंग इंडस्ट्री में आने वाले हर व्यक्ति के लिए यह अंतर समझना पहला कदम है।

ऑफ़सेट प्रिंटिंग

ऑफ़सेट (ऑफ़सेट लिथोग्राफ़ी) में धातु की प्लेट इस्तेमाल होती है। प्लेट का इमेज वाला हिस्सा स्याही पकड़ता है और बाकी हिस्सा पानी पकड़ता है, क्योंकि तेल और पानी आपस में नहीं मिलते। स्याही वाली इमेज पहले रबर ब्लैंकेट पर जाती है और फिर कागज़ या बोर्ड पर छपती है।

कहाँ इस्तेमाल होती है: किताबें, मैगज़ीन, ब्रोशर, पोस्टर, मोनो कार्टन और कागज़-बोर्ड पर हाई-क्वालिटी पैकेजिंग।

ख़ूबियाँ:

  • बेहतरीन इमेज क्वालिटी और एक जैसा रंग
  • मीडियम और लंबे रन के लिए बहुत किफ़ायती
  • कई तरह के कागज़ और बोर्ड पर अच्छा काम

सीमाएँ:

  • प्लेट बनाने और मशीन सेटअप (मेक-रेडी) में समय और मटीरियल लगता है
  • बहुत छोटे रन के लिए महँगी पड़ती है

फ्लेक्सो प्रिंटिंग

फ्लेक्सोग्राफ़ी में लचीली फ़ोटोपॉलिमर प्लेट सिलिंडर पर लगाई जाती है। छोटे-छोटे सेल वाला एनिलॉक्स रोलर जल्दी सूखने वाली स्याही की तय मात्रा प्लेट पर पहुँचाता है, और प्लेट सीधे मटीरियल पर छापती है।

कहाँ इस्तेमाल होती है: लेबल, फ़्लेक्सिबल पैकेजिंग (फ़िल्म, पाउच), कोरुगेटेड बॉक्स, पेपर बैग और टेप।

ख़ूबियाँ:

  • कई तरह के मटीरियल पर छपाई - प्लास्टिक फ़िल्म, फ़ॉइल, क्राफ़्ट, कोरुगेटेड बोर्ड
  • तेज़ रफ़्तार, रोल-टू-रोल प्रोडक्शन के लिए उपयुक्त
  • लंबे पैकेजिंग रन के लिए आदर्श

सीमाएँ:

  • छोटे जॉब में प्लेट और सेटअप की लागत बढ़ जाती है
  • बारीक डिटेल और फ़ोटो जैसी क्वालिटी के लिए कुशल प्रीप्रेस और प्रेस कंट्रोल चाहिए

डिजिटल प्रिंटिंग

डिजिटल प्रिंटिंग में प्लेट की ज़रूरत नहीं होती। फ़ाइल सीधे कंप्यूटर से मशीन पर जाती है, जो टोनर या इंकजेट से छापती है।

कहाँ इस्तेमाल होती है: कम मात्रा के ब्रोशर, विज़िटिंग कार्ड, पर्सनलाइज़्ड मेलर, सैंपल पैकेजिंग, वेरिएबल डेटा वाले लेबल और प्रिंट-ऑन-डिमांड किताबें।

ख़ूबियाँ:

  • लगभग कोई सेटअप नहीं - बहुत जल्दी डिलीवरी
  • हर कॉपी अलग हो सकती है (नाम, QR कोड जैसा वेरिएबल डेटा)
  • छोटे रन और प्रोटोटाइप के लिए किफ़ायती

सीमाएँ:

  • लंबे रन में प्रति कॉपी लागत ज़्यादा रहती है
  • ऑफ़सेट या फ्लेक्सो की तुलना में शीट साइज़ और मटीरियल के विकल्प सीमित हो सकते हैं

एक नज़र में तुलना

  • छोटा रन (कुछ दर्जन से कुछ सौ कॉपी): आमतौर पर डिजिटल सबसे अच्छा।
  • कागज़ या बोर्ड पर मीडियम से लंबा रन: आमतौर पर ऑफ़सेट सबसे अच्छा।
  • फ़िल्म, लेबल या कोरुगेटेड पर लंबा रन: आमतौर पर फ्लेक्सो सबसे अच्छा।
  • पर्सनलाइज़ेशन चाहिए: डिजिटल।

कई आधुनिक फ़ैक्टरियाँ तीनों प्रोसेस चलाती हैं, और बहुत लंबे फ़्लेक्सिबल पैकेजिंग रन के लिए ग्रेव्योर भी, और हर जॉब के हिसाब से प्रोसेस चुनती हैं।

आपको कौन-सा सीखना चाहिए?

अगर आप कमर्शियल प्रिंटिंग या कार्टन पैकेजिंग में काम करना चाहते हैं तो ऑफ़सेट से शुरू करें। लेबल और फ़्लेक्सिबल पैकेजिंग में रुचि है तो फ्लेक्सो सीखें। डिजिटल की स्किल हर जगह काम आती है। सबसे अच्छे प्रोफ़ेशनल तीनों को समझते हैं ताकि ग्राहक को सही सलाह दे सकें और जॉब सही प्लान कर सकें - पढ़ें पैकेजिंग इंडस्ट्री में नौकरियाँ।

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